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Thursday, 31 December 2015

अशोक जी का अद्वितीय काम, दे रहा बेसहारा पक्षियों को आराम

ऐसे समय जब महाराष्ट्र में सूखे के कारण किसान खुद और अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी का इंतजाम कठिनाई से कर पा रहे हैं, तो क्या ऐसे में कल्पना की जा सकती है कि कोई किसान अपने पूरे खेत की फसल पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दे? कोल्हापुर से 15 किलोमीटर दूर गडमुडशिंगी गांव के कृषि मजदूर अशोक सोनुले ने इसकी मिसाल पेश की है। उन्होंने अपने 0.25 एकड़ में लगी ज्वार की पूरी फसल पक्षियों के खाने के
लिए छोड़ दी। इसी कारण उनके खेत में बबूल के पेड़ पर ढेरों पक्षियों ने घोंसले बना लिए हैं। अशोक जी ने देखा कि पक्षियों को प्यास बुझाने के लिए कोई पोखर, तालाब या नदी नहीं हैं तो उन्होंने उनके पानी पीने के लिए पेड़ पर कई सकोरे टांग दिए। वे कहते हैं, इन पक्षियों को खाना-पानी और आश्रय की जरूरत है। हम उन्हें अकेले कैसे छोड़ सकते हैं। हम तो मजदूरी करके भी अपना पेट पाल सकते हैं। अशोक जी के परिवार में 12 सदस्य हैं
और उनका परिवार अत्यंत गरीबी का सामना कर रहा है। इसके बावजूद उन्होंने अपनी फसल पक्षियों के लिए छोड़ कर इन मूक प्राणियों के प्रति अपनी सहृदयता का उदाहरण पेश किया है। अशोक सोनुले और उनके परिवार को बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी नसीब होती है। आसपास के सभी किसानो की ज़मीने सूखे की वजह से बंजर पड़ी है। पर अशोक जी के खेत में ज्वार की फसल लहलहाती है। पर अशोक इनसे पैसे कमाने के बजाय, ये सारी फसल पक्षियों के चुगने के लिये छोड़ देते हंै। उन्होंने खेत में बिजूका (पक्षियों को भगाने के लिए लगाया जाने वाला मानव रुपी पुतला) भी नहीं लगाया और पक्षियों के लिए पानी का घड़ा भी हमेशा भर कर रखते हंै। नैशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो(छब्त्ठ), गृह मंत्रालय, के सर्वेक्षण द्वारा ये पता चलता है कि 2014 में 5650 किसानांे ने आत्महत्या की है। फसल का ख़राब होना इन सभी आत्महत्याओ के पीछे एक सबसे बड़ा कारण है। आत्महत्या करने वाले 5650 किसानांे में 2358 किसान महाराष्ट्र राज्य के है। बेमौसम बारिश और सूखा इस आपदा की वजह है। इस परिस्थिति में जहाँ किसान को अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हैऐसे में एक परिवार अपनी पूरी फसल पक्षियों के खाने के लिये छोड़ देता है। जहाँ आमतौर पर किसान चिडियों को अपनी फसल का दुश्मन मानते है वही अशोक अपने खेत में आनेवाले पक्षियों को दाना खिलाने के लिये हमेशा तैयार रहते हंै। अशोक सोनुले और उनके दोनों बेटे प्रकाश और विलास
और उनका भाई बालू दूसरों के खेतों में मजदूरी करते हंै, ताकि वो परिवार के सदस्यों का भरण पोषण कर सके। अशोक सोनुले जी के परिवार के पास 0.25 एकड़ बंजर जमीन है, जिससे उन्हें एक वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता है। आसपास के इलाके की जमीन भी बंजर है। हर साल की तरह इस साल भी अशोक ने जून के महीने में ज्वार के बीज बोये थे। पर हर बार की तरह, इस साल भी सुखा पड़ाइसलिए उन्होंने ज्यादा फसल की अपेक्षा नहीं रखी थी। पूरा इलाका सूखे की चपेट में था। इसे कुदरत का करिश्मा ही कहिए कि कुछ ही महीनों में अशोक जी के खेत में सूखे के बावजूद ज्वार की फसल लहलहा रही थी और कटाई के लिये तैयार थी।
अशोक के खेत में बबूल के पेड़ पर पक्षियों ने अपना घोसला बनाया है। अशोक इस फसल को काटने ही लगे थे कि खेत के बीचो बीच लगे एक बबूल के पेड़ की वजह से उन्हें काम करने में दिक्कत होने लगी। उन्होंने बबूल के पेड़ को काटने की ठान ही ली थी, पर उन्होंने देखा कि आसपास की जमीन बंजर होने के कारण पंछी उनके खेत में लगे ज्वार पर ही निर्भर थे। इसलिये वो अपना घोसला उस बबूल के पेड़ पर बनाते थे। ये देख अशोक जी
का मन बदल गया और उन्होंने उस पेड़ को नहीं काटा। उन्हें ये एहसास हुआ कि आसपास के खेत बंजर पड़े हंै पर शायद इन पक्षियों के लिये ही उनका खेत हराभरा है। उन्होंने चिडियों के लिए खेत में पानी के घड़े रखे है।
इन पक्षीयों का चहचहाना अशोक जी के चेहरे पर मुस्कान ले आता है। वे मानते है कि उनके खेत की सारी फसल पर सिर्फ इन चिडियों का ही अधिकार है। सूखे की वजह से आसपास कहीं पानी भी नहीं है, इसलिये उनका पुरा परिवार पानी के घड़े खेत में और पेड़ पर रख देता है ताकि चिड़ियों को पानी की भी कमी हो। अशोक जी कहते हैइन पक्षियों को भी तो खाना, पानी और रहने के लिये जगह की जरुरत है। तो फिर मैं क्यों उन्हें भूखा प्यासा छोड़ सकता हूँ
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