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Thursday, 13 April 2017

सूरजदीन का इंजन देगा कोहरे को मात

कोहरे के कारण अब ट्रेन लेटलतीफी का शिकार नहीं होंगी। इसके साथ ही दुर्घटनाओं का ग्राफ भी शून्य होगा। सुलतानपुर जिले के गुप्तारगंज के सूरजदीन यादव ने एक ऐसा इंजन बनाया है जो भीषण कोहरे में भी सामान्य गति से चलेगा। बड़ी बात यह है कि उनकी इस पूरी तकनीक को लागू करने के लिए रेलवे को मात्र आठ से दस हजार रुपये खर्च करने होंगे।

ऐसे काम करेगा यह इंजन :
किसी भी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म से 1200 मीटर दूरी पर डिस्टेंस सिग्नल के आते ही इंजन में नीली बत्ती जलने लगेगी और हॉर्न बजना शुरू हो जाएगा। टेªन के होम सिग्नल यानी प्लेटफार्म पर आने से पहले इंजन में लाल व हरी लाइटें जलने लगेंगी। ड्राइवर सचेत हो जाएगा कि उसे प्लेटफार्म पर गाड़ी लेनी है। सूरजदीन का दावा है कि कोहरा होने पर स्टेशन से पहले आने वाले सभी प्रकार के सिग्नल की जानकारी इंजन में लगे उपकरणों के माध्यम से ड्राइवर को मिलती रहेगी। सिग्नल देखने के लिए ड्राइवर को कोहरे में अपना सिर इंजन के बाहर नहीं निकालना पड़ेगा और न ही ट्रेन की गति धीमी करनी पड़ेगी।


घर पर ही बनाया रेलवे ट्रैक :
सूरजदीन यादव इस आधुनिक इंजन को बनाने में 13 वर्ष से अधिक समय से लगे थे। उन्होंने घर में ही पूरा टैªक लोहे के एंगल का जाल बनाकर बिछाया और इंजन का मॉडल बनाकर परीक्षण किया।

डीआरएम को सौंपी सीडी :
सूरजदीन ने इंजन के संचालन से संबंधित सीडी व कुछ दस्तावेज उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल के डीआरएम अनिल कुमार लाहोटी को सौंपे हैं। लोहाटी का कहना है कि सूरजदीन के इंजन में मेहनत की गई है। रेलवे के लिहाज से यह कितना सफल होगा इसके लिए फिलहाल संबंधित सीडी व कागजात सीनियर डीएसटी को दिए गए हैं। पूरा प्रयोग देखा जाएगा। सूरजदीन ने अपनी खोज की जानकारी डीवीडी के माध्यम से प्रधानमंत्री व रेलमंत्री को भी भेजी है।

अब मानव रहित फाटक पर ध्यान
सूरजदीन अब ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जिससे मानव रहित फाटक से 500 मीटर पहले इंजन में अपने आप हाॅर्न बजने लगेगा। इससे ड्राइवर व मानव रहित पटरी से गुजरने वाले लोग भी सचेत हो जाएंगे। इसी तरह दो स्टेशनों के बीच पटरी टूटने पर दोनों स्टेशनों का पता चल जाएगा।

सिर्फ कक्षा आठ ही पास हैं सूरजदीन यादव :
आर्थिक तंगी के कारण सूरजदीन यादव जी अपनी शैक्षिक योग्यता जारी नहीं कर पाये। उन्होंने बताया कि कक्षा आठ के बाद वह आगे नहीं पढ़े, लेकिन बचपन से ही तकनीकी कार्यों में उनकी रुचि थी। उन्होंने बताया कि खेती से होने वाली थोड़ी बहुत आय का हिस्सा भी वे अपने इसी तकनीकी खोजों पर खर्च करते रहे हैं।
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