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Tuesday, 28 March 2017

जन्म से ही नेत्रहीन शख्स ने खडी कर दी 50 करोड़ की कम्पनी

सोचिये अगर आपकी आँखो पर पटटी बांध दी जाये तो आपको कैसा लगेगा ? आँखों पर पट्टी बाँध कर आप क्या-क्या काम कर सकते हैं ? अगर मैं अपनी बात करूँ तो मैं अपनी आखो पर पटटी बाँध कर सही तरह से खाना तक नहीं खा सकता |

अब जरा उन लोगों के बारे में सोचिये जो जन्म से ही नेत्रहीन है | वे लोग अपने दैनिक कार्य किस तरह से करते होंगे ? कितना कष्ट होता होगा उन्हें और कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ता होगा ? और कितनी मुश्किल होती होगी जब लोग उनकी मदद ना करके उनका उपहास उड़ाते होंगे या उनको अपने से दूर करते होंगे |


आज Gyan Versha के माध्यम से मैं एक ऐसे साहसी और बहादुर शख्स के बारे में बताने जा रहा हूँ जो जन्म से ही नेत्रहीन है और अपनी नेत्रहीनता की वजह से उसे समाज के लगभग हर दरवाजे से मदद के बजाय निराशा और इनकार मिला | लेकिन अपने हौसले, साहस और जिद से उस शख्स ने समाज के उन लोगों को आईना दिखाया और मात्र 23 वर्ष की उम्र में 50 करोड़ की कम्पनी खड़ी कर दी और उसका CEO बना और देश दुनियाँ के लाखो करोड़ों लोगों का प्रेरणास्रोत बना |

उस शख्स का नाम है श्रीकांत बोला | जो जन्म से नेत्रहीन है और डिस्पोजल कंज्यूमर पैकेजिंग सॉल्यूशंस कम्पनी बोलांट इण्डस्ट्रीज के CEO हैं| आईये उनकी प्रेरणादायक जिन्दगी के बारे में जानते हैं |
श्रीकांत का बचपन

श्रीकांत का जन्म 7 जुलाई 1991 को आंध्रप्रदेश के कृष्णा जिले के सीतारामपुरम नामक गाँव में हुआ था | इनके माता पिता ज्यदा पढ़े लिखे नही थे और बहुत ही गरीब थे | श्रीकांत के जन्म के समय परिवार की मासिक आय लगभग 1600 रु० थी जो कि बहुत ही कम थी| जिस के कारण इनका बचपन बहुत ही कठिनाइयों में बीता | अमूमन जब किसी के घर पर लड़के का जन्म होता है तो उसके माँ बाप, पास पड़ोस, रिश्तेदार आदि सब बहुत खुश होते हैं लेकिन श्रीकांत के जन्म के समय ऐसा कुछ नही हुआ क्योंकि श्रीकांत जन्म से ही नेत्रहीन थे |
जिन्दगी की पहली मुश्किल ( जब गाँव वालों ने कहा कि इसे मार दो )

श्रीकांत की पहली मुसीबत इनके जन्म लेते ही आ गयी | श्रीकांत जन्म से ही नेत्रहीन थे | इसलिए जब पड़ोसियों को इनके नेत्रहीन होने का पता चला तो उन्होंने इनके माता पिता को सलाह दी कि इतनी गरीबी में सारी जिन्दगी की परेशानी और दुःख सहने से अच्छा है कि इस बच्चे का गला घोट कर अभी मार दो | लेकिन माँ बाप का दिल बड़ा महान होता है | इनके माता पिता ने पड़ोसियों की बात ना मान कर इन्हें पालने का निश्चय किया (I salute for them) और पूरी ममता और प्रेम से उनका पालन पोषण किया |

जिन्दगी की दूसरी मुश्किल (जब स्कूल में इनके साथ बुरा बर्ताव हुआ)

जब श्रीकांत बड़े हो रहे थे तो उनके पिता उन्हें अपने साथ खेतों में ले जाने लगे लेकिन वे अपने पिता की कोई मदद नहीं कर पाते थे| इसलिए उनके पिता ने तय किया कि वे उन्हें पढ़ाएंगे और उन्होंने गाँव के पास एक स्कूल में श्रीकांत का दाखिला करा दिया | वे गाँव से 5 कि०मी० दूर स्कूल जाते थे | लेकिन स्कूल में उनके साथ बहुत बुरा बर्ताव होता था | उन्हें क्लास में सबसे पीछे वाली बैंच पर बिठाया जाता था | दूसरे बच्चे किसी भी खेल और प्रतियोगिता में उन्हें अपने साथ शामिल नहीं करते थे | शिक्षक भी उन्हें पसंद नहीं करते थे क्योंकि वे उन्हें देख नहीं पाते थे और कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर पाते थे |

तब इनके पिता को एहसास हुआ वे वहाँ पर कुछ भी नहीं सीख पा रहे हैं | इसके बाद इनके पिता ने कुछ पैसो की बचत करके उन्हें एक स्पेशल स्कूल में हैदराबाद भेज दिया जहाँ पर अशक्त बच्चों को शिक्षा दी जाती थी |
जिन्दगी की तीसरी मुश्किल (जब दसवी के बाद उन्हें साइंस पढने के लिए मना किया)

हैदराबाद के स्पेशल स्कूल में मिले प्यार, ममता और देखरेख के कारण वे बहुत जल्दी चीजो को सीखने लगे और पढाई लिखाई और खेलों में बेहतर होते गये | वे वहाँ पर शतरंज, क्रिकेट आदि खेल भी खेलने लगे | उन्होंने अपनी ज्यादातर क्लास में टॉप किया और दसवीं की परीक्षा 92% अंको के साथ पास की| इसके बाद उन्हें पूर्व राष्ट्रपति डॉ० ए० पी० जे० अब्दुल कलाम के साथ लीड इंडिया प्रोजेक्ट में काम करने का मौका भी मिला | दसवी के बाद ये साइंस विषय पढना चाहते थे | लेकिन उन्हें साइंस साइड में प्रवेश नहीं मिला | आन्ध्र प्रदेश बोर्ड ने उनसे कहा कि वे विकलांग हैं इसलिए वे सिर्फ आर्ट साइड के विषय ही ले सकते हैं | इस पर उन्होंने आन्ध्र प्रदेश बोर्ड पर मुकदमा कर दिया और अपने हक के लिए 6 महीने तक लड़ाई लड़ी | आखिरकार सरकार की ओर से उन्हें ‘अपने रिस्क’ पर विज्ञान विषय लेने का आदेश मिला | इस तरह वे देश के पहले विकलांग बन गये जिसे दसवीं के बाद साइंस पढने के इजाजत मिली |

इसके बाद उन्होंने सारी किताबें Audio Format में हासिल की और दिन रात एक करके मेहनत से पढाई की तथा 12वी की परीक्षा 98% अंको के साथ पास की |

जिन्दगी की चौथी मुश्किल (जब IIT ने उन्हें दाखिला देने से मना किया )

बारहवीं करने के बाद उनके सामने एक बार फिर मुश्किल आई जब उन्होंने देश के सभी इंजीनियरिंग कॉलेजों, बिट्स पिलानी तथा IIT के लिए apply किया | लेकिन प्रवेश परीक्षा के लिए उन्हें Admit Card नहीं मिला | इन सभी Colleges ने यह कहकर उन्हें मना कर दिया कि वे नेत्रहीन हैं इसलिए प्रतियोगी परीक्षा नहीं दे सकते |

MIT America में एडमिशन

भारत में इंजीनियरिंग करने की इजाजत नहीं मिलने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने अमेरिका में प्रवेश के लिए कई संस्थानों में आवेदन किया, जो विशेष तौर से नि:शक्तो के लिए बने थे | उन्हें वहाँ के चार बड़े संस्थानों MIT, स्टैनफोर्ड, बर्कले तथा कार्नेगी मेलान में एडमिशन के लिए चुना गया | श्रीकांत ने इनमे से MIT को चुना और स्कॉलरशिप लेकर पढाई की | इस तरह वे स्कूल के इतिहास के और MIT में पढ़ने वाले भारत के पहले नेत्रहीन छात्र बनें |



एक कमरे से शुरुआत की और 50 करोड़ की कम्पनी खड़ी कर दी |

MIT में पढाई के दौरान उनके दिमाग में हमेशा ये चलता रहा कि कुछ ऐसा किया जाये जिससे लोगो को रोजगार मिले| जिससे विकलांग भी सम्मान के साथ अपनी जीविका चला सकें |

इसलिए श्रीकांत ने हैदराबाद में एक टीन के छत वाले छोटे से कमरे में 3 मशीनों और 8 लोगों के साथ 23 वर्ष की उम्र में शुरुआत की | धीरे धीरे यह शुरुआत एक कम्पनी में बदल गयी | उन्होंने इस कम्पनी का नाम बोलांट इंडस्ट्रीज रखा और इसके CEO बन गये | उनकी कम्पनी इको फ्रेंडली डिस्पोजल कंज्यूमर पैकेजिंग प्रोडक्ट बनाती है | उनकी कम्पनी अनपढ़ तथा नि:शक्त लोगो को रोजगार देती है |

आज श्रीकांत की कम्पनी 50 करोड़ की कम्पनी बन चुकी है और इनके हैदराबाद, हुबली तथा निजामाबाद में चार प्लांट हैं तथा एक प्लांट और शुरू करने की योजना बना रहे हैं |
श्रीकांत की सोच और विजन

श्रीकांत के अन्दर एक हार ना मानने वाला जज्बा है और उन्हें अपनी काबिलियत पर पूरा भरोसा है |

वे कहते हैं कि “जब दुनिया कहती थी कि ये कुछ नहीं कर सकता, तो मैं कहता था कि मैं कुछ भी कर सकता हूँ | मेरे लिए कुछ भी असंभव नहीं है |”

2006 में एक बार डॉ० ए० पी० जे० अब्दुल कलाम ने एक प्रोग्राम में बच्चों से एक प्रश्न पूछा कि “आप जीवन में क्या बनना चाहते हो ?” तब श्रीकांत ने सबसे तेज आवाज में जवाब दिया था कि “मैं भारत के पहला नेत्रहीन राष्ट्रपति बनना चाहता हूँ” |



“उनका कहना है कि मैं खुद को सबसे भाग्शाली मानता हूँ, इसलिए नहीं कि अब मैं करोड़पति हूँ, बल्कि इसलिए क्योंकि मेरे माता पिता ने कभी भी मेरे नेत्रहीन होने को अभिशाप नहीं समझा और मुझे इतनी गरीबी के बावजूद पढ़ाया | मेरी नजर में वे दुनिया के सबसे धनी लोग हैं |

श्रीकांत का मानना है कि अगर आपको अपनी जिन्दगी में सफल होना है तो अपने बुरे समय में धैर्य बना कर रखें, और समाज द्वारा तय सीमाओं को निडरता से तोड़ दीजिये |

तो दोस्तों आपने देखा कि कैसे जन्म से ही नेत्रहीन एक शख्स ने अपने हौंसले, कभी हार ना मानने वाले जज्बे से और अपने साहस से तमाम मुश्किलों , मुसीबतों को हराकर 23 वर्ष की उम्र में ही 50 करोड़ की कंपनी खड़ी कर दी और देश दुनियाँ के लाखों करोडो लोगों के लिए एक मिसाल और प्रेरणा का स्रोत बन गया |

दोस्तों अगर आपको अपनी काबिलियत पे भरोसा है , आपके अंदर अपने सपने को पूरा करने का हौंसला है, कभी हार ना मानने वाला जज्बा है तो दुनियां की कोई भी चुनौती , कोई भी मुश्किल, कोई भी मुसीबत आपका रास्ता नहीं रोक सकती , आपको सफल होने से नहीं रोक सकती |

एक प्रार्थना

दोस्तों आशक्त होना, विकलांग होना अपने आप में ही एक अभिशाप है | इसलिए अगर आपके आस पास भी कोई आशक्त या विकलांग है तो कृपया उसके साथ कभी भी बुरा बर्ताव ना करें | आपसे जितना भी हो सके उसकी मदद करें, उसे हमदर्दी का एहसास करायें, उसे ज़िन्दगी में आगे बढ़ने का रास्ता दिखायें | ऐसा करने से आपको बड़ा पुण्य मिलेगा | क्या पता आपके छोटे से प्रयास से , आपकी थोड़ी सी हमदर्दी से किसी विकलांग की ज़िन्दगी बदल जाये ?
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