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Saturday, 25 March 2017

विक्रम राठोर ने विकसित किया साइकिल से चालित पानी वाला पंप

विक्रम राठोर (49) आंध्र प्रदेश में नरसापुर गाँव, उतनूर मंडल, अदीलाबाद से एक छोटे आदिवासी किसान है। वह बंजारा समुदाय से संबंधित हैं जो अर्द्ध-खानाबदोश समुदाय है जो कई सौ वर्ष पूर्व राजस्थान से प्रवासित हुए थे। वह साइकिलों और अन्य छोटी मशीनों को सुधारकर अपनी जीविका अर्जित करते हैं। उन्होंने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की और फिर वित्तीय बाधाओं के कारण अपना अध्ययन छोड़ दिया। उन्हें अपनी पहली पत्नी से कोई बच्चा नहीं था और इसलिए पुनरू विवाह किया और अब पाँच बच्चे हैं।

प्रारंभ से ही विक्रम राठोर के पास चार एकड़ भूमि है जिस पर वह कपास की खेती करते हैं। कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने एक एकड़ पर धान उगाई थी जिसने वर्षा की कमी के कारण मुरझाना शुरु कर दिया । किंतु पानी को पंप करने के लिए उनके पास कोई विद्युत मोटर या डीजल इंजन नहीं था। इसलिए उन्होंने अपनी फसलों में पानी देने के लिए अपने भाई से उसकी विद्युत मोटर देने को कहा किंतु उनके भाई ने इसको उन्हें देने से मना कर दिया। चूँकि बचपन से ही, विक्रम राठोर पंक्चर सुधारते रहे हैं और विभिन्न उत्पादों के बारे में स्वप्न देखते रहे हैं। उन्होंने इस अवरोध से पार पाने के लिए बेहतर उपयोग करने हेतु मन में तकनीकी झुकाव सोचना शुरू कर दिया। उन्होंने एक विद्युत मोटर का उपयोग करके जमीन से पानी खींचने की यांत्रिकी का अवलोकन किया जिसमें एक इंजन पंखा घुमाता है जो पानी को जमीन से बहार खींचने को सक्षम करता है।


इसने उन्हें यह देखने के लिए विचार दिया कि क्या हाथ से पंखा घुमाने पर पानी ऊपर आएगा कि नहीं। उन्होंने इसका प्रयास किया और देखा कि कुछ पानी ऊपर आ रहा है। फिर उन्होंने पंखे को तेज घुमाया और अवलोकन किया कि पानी तेज दाब से ऊपर आ रहा था। फिर उन्होंने पानी पंप करने के लिए एक साइकिल का उपयोग करने का सोचा, किंतु उनके पास कोई साइकिल नहीं थी। उस समय, उनकी वित्तीय स्थिति इतनी कसी हुई थी कि उन्हें उनके घर में रखी ज्वार बेचना पड़ी जिसे उन्होंने भोजन के लिए संग्रहित किया था और एक पुरानी साइकिल खरीदी। उन्होंने एक तेल मिल के परिसर में कुछ पुराने गियर डले हुए देखे थे और उन्होंने मालिक से इन गियरों को उन्हें देने का अनुरोध किया और एक कबाड़ की दुकान से कुछ अन्य पार्ट्स खरीदे। उन्होंने एक एचपी मोटर भी खरीदी और फिर अपने पंप पर कार्य करना शुरु किया।

उन्होंने साइकिल की पिछली रिम को एक रस्सी के साथ पंखे में जोड़ दिया और साइकिलों के वलयों को घुमाया जिससे वह धान की सिंचाई करने के लिए एक धारा से जल की अच्छी मात्रा पंप करने में सक्षम थे। लाभ पारंपरिक सेंट्रीफ्यूगल पंप को बिजली या डीजल इंजन की आवश्यकता होती है, किंतु वर्तमान नवप्रवर्तन पेडल चलाने पर कार्य करता है। यह प्रदूषण रहित और पर्यावरण के अनुकूल युक्ति है। चूँकि यह सामान्य रूप से उपलब्ध सामग्री से बनी होती है और कीमत रु. 3000 है इसलिए यह आम लोगों के लिए वहनीय है। इसमें कम रखरखाव की आवश्यकता होती है और जल का अधिकतम परिणाम प्राप्त करने के लिए न्यूनतम निवेश ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस युक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से लाया ले जाया जा सकता है। सिस्टम का उपयोग आटा चक्की में किया जा सकता है। पहचान अदीलाबाद जिला, जहाँ से विक्रम राठोर आते हैं, एक सूखाग्रस्त क्षेत्र है जहाँ मुश्किल से 20” वर्षा होती है और जो बहुत असमतल रूप से वितरित भी है।


इसलिए इस डिवाइस की क्षेत्र में बहुत संगतता है और उनके गाँव के लोगों ने डिवाइस का कार्य करना देखकर उनमें विश्वास करना शुरु कर दिया। लगभग उसी समय उतनूर के आईटीडीए परियोजना अधिकारी को इस नवप्रर्वतन के बारे में पता चला और इस पंप का प्रदर्शन देखने पर वह बहुत प्रभावित थे। आईटीडीए ने विक्रम को उनकी डिजाइन सुधारने के लिए वित्तीय रूप से सहायता की और उनकी सहायता से उन्होंने कुछ और साइकिल रिंग्स खरीदीं और एक नया मॉडल डिजाइन किया जिसके साथ वह पानी की उतनी ही मात्रा उठाने में सक्षम थे जितनी एक 3एचपी विद्युत मोटर उठा सकती थी।

उनके नवप्रवर्तन ने बहुतों का ध्यान खींचा और कुछ वर्ष पूर्व, हैदराबाद से कुछ लोग उन्हें एक बड़े पुरस्कार का वायदा करते हुए उनके पास आए। वे उन्हें उनके साथ ले गए और उन्हें छरू दृ सात दिनों तक एक घर में रखा जहाँ उन्हें उचित रूप से खाना भी नहीं दिया। वह किसी तरह वह से बाख निकले और अपने गाँव वापस लौटे। इस बीच किसी ने उन्हें और आगे कोई कार्य करने से पहले अपने पंप के लिए पैटेंट फाइल करने की सलाह दी। वह जिलाधीश श्री सुकुमार के पास गए जिन्होंने पैटेंट करने में उनकी सहायता करने के लिए हैदराबाद में उच्च अधिकारियों को लिखा किंतु दुर्भाग्यवश कुछ नहीं हुआ।

नवप्रवर्तन जो उन्होंने बनाया था वह किसी तरह स्थानीयकृत रहा और लोगों के बीच अत्यधिक रुचि के बावजूद प्रचलित नहीं हुआ क्योंकि वह सुनिश्चित नहीं थे कि पैटेंट कराये बिना उन्हें श्रेय मिलेगा। राष्ट्रीय नवप्रर्वतन ने अब नवप्रवर्तन के लिए एक पैटेंट फाइल किया है। कई बाधाएँ जिनका उन्होंने सामना किया, नवप्रर्वतन के लिए उनके जोश को जारी रखने से उन्हें रोक नहीं सकीं। तद्ानुसार उन्होंने एक हाथ से चलाने वाली आटा चक्की का विकास किया जो साइकिल के पैडल के घूमने से चलती है। इस आटा चक्की को विद्युत या किसी अन्य संसाधन की आवश्यकता नहीं होती है। यह दक्ष है और लगभग पाँच-छः मिनटों में एक किलोग्राम अनाज को चूर्ण में पीसती है। महान कल्पना और दृढ़ता के व्यक्ति, वर्तमान में उन्हें एक साइकिल का उपयोग करके विद्युत उत्पन्न करने का विचार आया है और वायदा करते हैं कि यदि उन्हें वित्तीय सहायता दी जाती है, तो वे अपने संपूर्ण गाँव में प्रदान करने के लिए पर्याप्त विद्युत उत्पन्न कर सकते हैं।

यह नवप्रर्वतनशील उत्साह का एक प्रशंसनीय उदाहरण है जो दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में फैलता है। जहाँ एक व्यक्ति की रचनात्मकता जीवन को सुधारने और नौकरियाँ उत्पन्न करने के लिए आधार बन सकती हैं। यह एक सेंट्रीफ्यूगल वाटर पंप है जिसे एक साइकिल के पैडल को घुमाकर चलाया जाता है। प्रणाली में एक साइकिल, रिम, बेल्ट, घिरनी, इंपेलर और प्रवेश एवं निकासी पाइप होते हैं। एक खाली रिम साइकिल के पिछले पहिए को प्रतिस्थापित करती है। रिम को छोटे व्यास वाली अन्य घिरनी से जोड़ा जाता है। छोटी घिरनी के सहायक शैफ्ट अन्य रिम को दूसरे चरण वाली गति वृद्धि के लिए ले जाते हैं। प्रणाली का संवेग बढ़ाने के लिए शैफ्ट एक फ्लायव्हील को भी ले जाता है।

अंतिम सहायक शैफ्ट को एक इंपेलर से जोड़ा जाता है जो उच्च गति पर घूमता है और पानी को पंप करता है। पैडल करने की इस प्रक्रिया से उत्पन्न विद्युत (ऊर्जा) का उपयोग पानी को उठाने के लिए और पानी को किसी पाइप से खेत में कृषि के लिए ले जाने के लिए किया जाता है। यह नवप्रवर्तन नदियों, तालाबों, कुओं और समान जल स्रोतों से पानी को पंप करने के लिए उपयोगी है इस प्रकार सिंचाई और कृषि के लिए पानी पंप करने के लिए गरीब किसानों को सक्षम करता है।
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