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Saturday, 25 March 2017

एशियाइ गेण्डे और हाथी की घटती संख्या को बचाने के लिए शुरू किया कागज बनाना

महेश चंद्र बोरा और निशा बोरा कागज बनाते है। परंतु इस कागज की खास बात यह है कि इसे बनाने के लिए वे गेण्डे और हाथी के गोबर का प्रयोग करते है। उनके इस उपक्रम का मकसद एक सींग वाले एशियाइ गेण्डे को बचाना है। पुरी दुनिया में जीतने भी एक सींग वाले गेण्डे बचे है उसमे से 80 प्रतिशत असम मे पाये जाते है, परंतु इनकी संख्या मे बेहद तेज़ी गिरावट आ रही है। एक तरफ काले बाज़ार मे इनके सींगों की ऊँची कीमत की वजह से इन्हे अवैध तरीकों से मारा जा रहा है वही दूसरी तरफ किसान अपनी खेती को इनसे बचाने के लिए इन्हें मार रहे है।


महेश चंद्र बोरा एक सेवानिवृत कोल माइनिंग इंजीनियर है। 2009 मे दिल्ली से गुवाहाटी लौटते वक़्त एक पत्रिका मे उन्होने एक लेख पड़ा था। जिसमे लिखा था की कैसे एक महिला राजस्थान मे हाथी के गोबर से कागज बनाती है। वही से उन्हे यह विचार आया की “ऐसा ही कुछ हम असम मे क्यो नहीं कर सकते है। राजस्थान मे, जहाँ हाथी प्रकृतिक रूप से नहीं पाये जाते, वहाँ अगर ऐसा हो सकता है तो असम मे तो हाथियों की कोई कमी नहीं है। और अगर हम इसमे गेण्डे के गोबर को भी प्रयोग करने लगे तो उन्हे बचाने मे भी मदद मिलेगी।”


इसी विचार के साथ महेश चंद्र बोरा राजस्थान गए, वहाँ कागज बनाना सीखा और असम आकार Elrhino की स्थापना की। आज उनका यह उपक्रम आस-पास के गाँवो से 15 लोगों को प्रत्यक्ष और 150 से ज्यादा लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार उपलब्ध करवा रहा है। महेश कहते है इसका बड़ा श्रेय मेरी बेटी निशा को जाता है। जब मै Elrhino को स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहा था तब उसने मेरा साथ दिया और आज की तारीख मे एक तरह से देखा जाए तो वो ही इस बिज़नस को संभाल रही है।

“जब पापा ने Elrhino की शुरुआत की थी तब लगभग हमे सभी शुभचिंतकों ने इस विचार को सिरे से नकार दिया था। उनका यही कहना था कि यह काम सिर्फ वक़्त और पैसे कि बर्बादी है, पर पापा को इस पर पूरा विश्वास था।

उस वक़्त मैं मुंबई मे काम करती थी। जब भी मैं असम आती थी तो पापा कि लगन और उनके काम को देखकर बहुत प्रेरित होती थी। यह वो वक़्त था जब मैं भी अपनी ज़िंदगी कुछ अलग खोज रही थी, जो कुछ नया हो, रोचक हो और चुनौतीपूर्ण हो। तब मैंने पापा के साथ जुडने का फैसला कर लिया।” निशा बोरा

अपने सफल कॉर्पोरेट करियर को छोड़कर जब निशा ने Elrhino कि कमान संभाली तब उन्हे नहीं पता था कि यह एक दिन एक ब्रांड बन जाएगा। उनका ऐसा इरादा भी नहीं था। उनकी यही कोशिश थी कि बस बेहतर काम करते हुए कैसे लोगों को जमीनी स्तर पर लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकें, जिससे गेणडों को बचाने कि उनकी यह मुहिम ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुँच सकें।

निशा कहती है की, “आज Elrhino एक ब्रांड बन गया है, पूरे विश्व मे हमारे काम को पहचान मिल रही है, ज्यादा से ज्यादा लोग हमारे काम से प्रेरित हो रहे है, हमसे जुड़ना चाहते है। यह सब इतना आसान नहीं था। हम इस सोच के साथ कागज बना रहे थे की लोग इसे खरीदेंगे और इससे हम ज्यादा से ज्यादा लोगों तक हमारी बात पहुँचा सकेंगे, पर जल्द ही हमे पता लग गया कि हमारे पास कोई खरीददार नहीं है। तब हमने एक नयी सीएच के साथ इस कागज से कई सारे प्रोडक्टस बनाने किए किए। हमने लैम्प शेड्स, पेन स्टैंडस, डाइरीस, ताश आदि कई प्रयोग किए और उन्हे विभिन्न ट्रेड फेयर्स, प्रदर्शनियों के मध्यम से लोगों के बीच मे लेके गए, वही दूसरी तरफ हमने सोशल मीडिया का प्रयोग करते हुए लोगों तक पहुँचने कि कोशिश की। हमारी दोनों कोशिशों के माध्यम से न सिर्फ लोगों तक हमारा काम पहुँचा बल्कि उन्होने हमारे काम को सराहा भी।”

Elrhino अपने कागज के लिए कच्चा माल राष्ट्रीय उद्यान से लेने कि जगह सीधे किसानों और गाँव वालों से लेता है। इसके माध्यम से वे उन्हें न सिर्फ उनके रोज़मर्रा के काम के साथ-साथ आय का अन्य विकल्प भी उपलब्ध करवा रहा है अपितु, उन्हें वन्य जीवों के संरक्षण कि इस मुहिम से सीधे रूप से जोड़ रहा है। उनकी इस कोशिश का नतीजा उन्हे अब दिखने भी लगा है। स्थानीय लोग भी अब उनके काम कि सराहना करने लगे है और उनसे जुड़कर काम करना चाहते है।

निशा और महेश बोरा कहते है कि Elrhino के आधारभूत मूल्यों कि वजह से हम किसी भी प्रकार के कागज़ निर्माता के साथ दौड़ मे नहीं है। हमारी प्राथमिकता स्थानीय लोगों को बेहतर रोजगार उपलब्ध करने कि है और हमारे क्रेताओं को जागरूक करने की है, वो जिस वस्तु पर अपना पैसा खर्च कर रहे है, वो पैसा किस काम के लिए प्रयोग मे लिए जा रहा है।

इसके अलावा अब हमारी यह कोशिश है कि कैसे आस-पास के सभी गाँवो को एक सूत्र मे पिरोया जा सके जिससे वे गेण्डे के संरक्षण, उनके हक लिए आवाज़ उठाने के साथ-साथ कागज भी बना सके और उनके लिए आय के नए स्त्रौत तैयार हो सकें।
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