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Saturday, 25 March 2017

गौरी - कृष्णन ने यैलो बैग बनाकर दिया प्लास्टिक बैग का विकल्प

प्लास्टिक बैग (थैलियाँ) हमारी ज़िंदगी मे सबसे पहले 1977 मे आए थे। इन्हे सबसे पहले न्यूयॉर्क के सुपरमार्केट मे प्रयोग किया गया था। इन चालीस सालों मे प्लास्टिक बैग हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गए है। औसतन दुनिया का हर व्यक्ति 200 प्लास्टिक बैग हर साल उपयोग कर कचरे मे डाल देता है। हर साल हम 10 खरब(1 ट्रिल्यन) प्लास्टिक बैग्स का उपयोग करते है, यानि लगभग 20 लाख प्लास्टिक बैग प्रति मिनिट। एक प्लास्टिक बेग को फिर से धरती मे समाने के लिए लगभग 1000 साल लगते है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है की स्थिति कितनी भयानक है। एक शोध के अनुसार वैज्ञानिकों ने पता लगाया है की महासागरों के प्रति वर्ग मील मे करीब 46,000 प्लास्टिक के बैग तैर रहे है। उत्तरी प्रशांत महासागर मे प्लास्टिक के कचरे से एक पूरा टापू बन गया है जो फ़्रांस के क्षेत्रफल से दुगना है। जिसे The great pacific garbage patch के नाम से भी जाना जाता है।


भारत मे 99 प्रतिशत खुदरा व्यापारी प्लास्टिक बैग्स का प्रयोग करते है और 80 प्रतिशत उपभोक्ता ख़रीदारी के लिए प्लास्टिक बैग्स को तवज्जो देते है। इसमे से 80 प्रतिशत का कहना है की वे इन प्लास्टिक बैग्स का सिर्फ एक बार ही उपयोग करते है उसके बाद वे उन्हे कचरे मे फेंक देते है। ऐसे मे प्लास्टिक बैग्स का उचित विकल्प खोजना बेहद आवश्यक हो गया है। मदुरै से गौरी और कृष्णन अपने उपक्रम The Yellow Bag के माध्यम से ऐसे ही कुछ व्याहवहारिक विकल्प प्रस्तुत करते है, जो ना सिर्फ हमारे पर्यावरण के लिए सेहतमंद है अपितु इसके माध्यम से वे समाज के आर्थिक रूप से असक्षम तबके को आय का एक नवीन स्त्रौत भी प्रदान कर रहे है।

कृष्णन कहते है कि “मैं और मेरी पत्नी गौरी चेन्नई मे दो बड़ी MNCs में काम करते हुए एक साधारण और सुखी दाम्पत्य जीवन जी रहे थे। दुनिया के नज़रिये से खुशहाली के लिए जो भी साधन चाहिए हमारे पास वो सबकुछ था। 2010 मे हमे कुदरत ने एक खूबसूरत बेटी के तोहफे से नवाजा और वहीं से हमारे दुनिया को देखने का नज़रिया भी बदलने लगा। जब हमारी बेटी चार्मी दो साल की थी तब वो बेहद बीमार रहने लगी थी। उसे सांस लेने बेहद तकलीफ हो रही थी तब हमने उसके इलाज़ के लिए कई अस्पतालों के चक्कर लगाए पर कही भी हमे संतुष्टि नहीं मिल पायी । हम समझने की कोशिश कर रहे थे की ऐसा क्यो हो रहा है, चार्मी की बीमारी के क्या कारण है पर हमे कहीं से भी कोई ठोस कारण नहीं समझ आ रहा था। तब हमने ऐलोपथी इलाज़ से हटकर विभिन्न विकल्प खोजने शुरू किए। जब हमने उसका ऐलोपथी इलाज़ रोककर तमिलनाडू के एक पारंपरिक वैद्य से उसका इलाज़ शुरू किया। हमारे लिए आश्चर्य की बात थी कि चार्मी की एक साल की तकलीफ और हमारा एक साल का मानसिक अवसाद सिर्फ दो महीनों मे ठीक हो गया।


इसने हमे सोचने पर मजबूर कर दिया कि हमे जो बताया गया हो या जो सिखाया गया हो, वो ही सही हो या एकमात्र विकल्प हो ये जरूरी नहीं है। जीने के और भी कई तरीके हो सकते है जिनके बारे मे हम अंजान हो क्योंकि हमे कभी उनके बारे मे न तो पढ़ाया गया न ही बताया गया। तब हम इन वैकल्पिक जीवनशैली की तरफ आकर्षित होने लगे। हम सोचने लगे थे की हम जो भी काम कर रहे है उससे समाज पर क्या असर हो रहा है, उसे वापिस हम क्या दे रहे है और हम आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ कर जाएंगे। तब हम धीरे-धीरे अपनी आदतों मे बदलाव करने लगे और रोज़मर्रा की उपयोग मे आने वाली चीज़ों के स्थायी विकल्प तलाशने लगे जिससे हम अपने घर मे कचरे को कम से कम कर सकें। ऐसे ही एक प्रयोग के दौरान हमने तय किया की हम प्लास्टिक की थैलियों की जगह कपडे के थैले का इस्तेमाल करेंगे और जब हम खोजने लगे तो हमने पाया की हमारे घर मे एक भी कपड़े की थैली नहीं है। इस घटना ने हमे इस समस्या पर गंभीरता से सोचने पर मजबूर कर दिया।”


गौरी बात को आगे बढ़ाते हुए कहती है की “हम दोनों का जन्म स्थान मदुरै है और मदुरै मे एक परंपरा रही है की लोग अपने घरों मे कपड़े के बैग बनाकर उनका इस्तेमाल किया करते थे। शादी या कोई और भी कार्यक्रम हो लोग उपहार देने के लिए इन थैलियों का प्रयोग किया करते थे। तब हमने मदुरै से कुछ थैलियाँ मंगाई और उन्हे कुछ दोस्तों मे व कुछ कार्यक्रम मे बाँटना शुरू किया। पर हमने कभी सोचा नहीं था की हम भविष्य मे यही काम करेंगे। पर जब हमे लोगों से और दोस्तों से सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ मिलने लगी, तब हम इस काम को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने लगे और एक वक़्त ऐसा आया की हमे लगने लगा की अब हमे इस काम को अगर आगे बढ़ाना है तो हमे इसे अपना पूरा समय देना पड़ेगा और तब पहले मैंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया और कुछ समय बाद कृष्णन भी अपनी नौकरी छोड़कर इस काम मे पूरी तरह जुड़ गए।”

अपनी नौकरी छोड़ने के बाद गौरी और कृष्णन चेन्नई से मदुरै आ गए क्योंकि उनका सारा उत्पादन यहीं से हो रहा था। आज येल्लो बैग से मदुरै के आस-पास के क्षेत्र की 30 औरतें जुड़ी हुई है। यही नहीं, इसके अलावा वे कोशिश कर रहे है की इसमे उन औरतों को भी रोजगार मिल सकें जो मानसिक रूप से अस्वस्थ है। अभी उनके साथ ऐसी लगभग 10 औरते काम कर रही है जो उन्हे पेकिंग और उससे संबन्धित कामों मे उनकी मदद करती है। रोजाना ये औरते 1000 से ज्यादा बैग्स बनाती है। आज देशभर मे 150 से ज्यादा ग्राहक येल्लो बेग्स के साथ जुड़े हुए है जो लगभग 30000 बैग प्रतिमाह इनसे खरीद रहे है। गौरी और कृष्णन का लक्ष्य है की इस साल के अंत तक वे एक लाख बैग हर महीने बना सकें और ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्लास्टिक बैग के विकल्प उपलब्ध करा सकें। उनका कहना है की अगर कपड़े के एक बैग को हम सही तरीके से प्रयोग कर सकें तो यह एक बैग एक साल मे 1000 प्लास्टिक बैग को कचरे मे जाने से रोक सकता है। यह बैग न सिर्फ हमारे पर्यावरण के लिए सेहतमंद है अपितु इसके माध्यम से वे वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी चुनौती दे रहे और स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाकर उन्हे आर्थिक रूप से सक्षम बनाने की कोशिश कर रहे है।
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