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Saturday, 25 March 2017

सुखी जीवन छोड कर एक दाम्पत्य ने अपनाई जैविक खेती

हरित क्रांति से पहले हमारे खाने मे जैविक और अजैविक जैसा कोई अंतर नहीं था। हरित क्रांति के वक़्त हमारे किसानों तक यह कहकर पेस्टिसाइड्स पहुंचाया गया की इससे फसल में कीड़े नहीं लगेंगे,खेतों में ज्यादा पैदावार होगी और आपकों ज्यादा पैसा मिलेगा। दूसरी तरफ आम शहरी जनता को यह कहकर भ्रमित किया गया कि अगर भारत को खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर बनना है तो हमें इन रसायनों का प्रयोग करना जरूरी है। आज इस बात को 50 से भी ज्यादा साल हो गए है फिर भी हमारी दाल अफ्रीका मे उग रही है, हमारे किसान जिनकी आत्महत्या कि खबरें शायद ही कभी उस वक़्त सुनने को मिलती थी,आज अखबार उनकी आत्महत्याओं कि खबरों से भरा पड़ा है। खाद्य उत्पादन मे आत्म निर्भर तो हम नहीं बन पाये पर इन 50 सालों मे रोज़ रात को भूखे पेट सोने वाले लोगों कि संख्या मे बेहिसाब वृद्धि हुई है,बिल्कुल वैसे ही जैसे कुछ ओद्योगिक घरानों कि संपत्ति मे बेहिसाब वृद्धि हो रहीं है। खैर आम लोगों को इससे बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि किसान आत्महत्या क्यो कर रहा है,अंबानी या अदानी इतने अमीर कैसे हो रहे है, दाल या दूसरे अनाज हमें क्यो आयात करने पड़ रहे है,दूसरे जीव-जंतुओं पर इन का क्या असर हो रहा है आदि। पर वही जब उन्हें यह पता चलेगा की इन पेस्टिसाइड्स का उनकी सेहत पर क्या फर्क पड़ रहा है तो वो इस बारे मे सोचने लगता है। इसीलिए 50 सालों मे पहली बार आम जनता इस विषय से खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर रही है और इस विषय पर उसकी भागीदारी समय के साथ-साथ बढ़ती जा रही है। 

चेन्नई के पार्थसार्थी और रेखा हमारे समाज के बनाए गए नियमों के अंतर्गत एक सुखी दाम्पत्य जीवन जी रहे थे। दोनों ही मल्टी नेशनल कंपनीस में अच्छे पदों पर कार्यरत थे। अच्छी पगार के साथ सारी भौतिक सुख-सुविधाएं उनके आस-पास मौजूद थी। 10-12 घंटे रोजाना काम करने के बाद अपनी मेहनत की कमाई को वो हर उस वस्तु को भोगने मे खर्च कर रहें थे,जो टेलिविजन के विज्ञापन उन्हे भोगने के लिए बोलते थे चाहें उन्हे उसकी आवश्यकता हो या न हो। उनकी इस यात्रा की शुरुआत तब हुई जब उनके परिवार के सदस्य कई प्रकार की बीमारियों से ग्रसित होने लगे थे। तब वे सोचने पर मजबूर हो गए की उनके पास वो सारी सुख-सुविधाएं है जिनका एक आम भारतीय परिवार सपना देखता है फिर ऐसा क्या है जिसकी वजह से उन्हे ये सारी तकलीफ़ें हो रहीं है। तब उन्होने इस विषय पर कई किताबें पढ़ी और शोध किया। अपने शोध मे उन्होने यह पाया की हमारे शरीर मे पायी जाने वाली आधी से ज्यादा बीमारियाँ हमारे खाने मे पाये जाने पेस्टिसाइड्स के कारण पनप रहीं हैं और बाकी हमारे जीने तरीकों मे जो बदलाव आया है उस वजह से। दोनों अपनी जीवनशैली को बदलने के लिए गंभीरता से सोच रहे थे व धीरे-धीरे कुछ कदम इस दिशा मे बढ़ा रहे थे पर उनके जीवन में अहम मोड़ उस वक़्त आया जब उन्होने वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन (डबल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट पढ़ी जिसके अनुसार चेन्नई मे पेस्टिसाइड्स की वजह से माँ के दूध मे ज़हर पाया गया है। तब उन्हे एहसाह हुआ की उन्होने अभी कुछ नहीं किया तो शायद बेहद देर हो जाएगी। पार्थसर्थी बताते है की “हमारे शोध मे हमने पाया की आम तौर पर हम इस बात से बिलकुल अंजान है की पेस्टिसाइड्स हमारे शरीर मे जहर घोल रहा है। एक छोटी सी सूची, मै आपसे सांझा करना चाहूँगा जो की हमने अपने एक शोध के दौरान पढ़ी थी। इस सूची को कनाडा की सरकार ने जारी किया है जिसमे बताया गया है पेस्टिसाइड्स की वजह से हमे किस तरह की बीमारिया हो रहीं है” :-


वो आगे कहते है की जब हमे इस बारे मे पता चला तो हम अपने लिए जैविक भोजन के विकल्प तलाश करने लगे। मेरा और रेखा के परिवार की पृष्ठभूमि कृषि है। हमारे खाने का ज़्यादातर सामान हमारे खेतों से ही आता है। तब हमने तय किया की हम जाकर हमारे परिवार को समझायेंगे और जैविक तरीकों से खेती करने के लिए प्रेरित करेंगे। जब हम गाँव गए और उनसे जैविक खेती के बारे मे बात की तो उन लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ की जैविक तरीकों से खेती हो सकती है। तब हमे एहसास हुआ की विकास के नाम पर हरित क्रांति का हमारे कृषक समाज पर क्या असर हुआ है, की वो अपने पारम्परिक ज्ञान तक को भूल गया है। हमारी बात समझना तो दूर की बात वे लोग उल्टा हमारा मज़ाक बनाने लग गए थे। लेकिन हमने भी हिम्मत नहीं हारी , हमारी कोशिश लगातार जारी थी। इसके फलस्वरूप हमारे परिवार ने हमे ज़मीन का छोटा टुकड़ा सौंपते हुए कहाँ कि तुम इस ज़मीन पर अपने तरीकों से खेती करके बताओं। हमे लगा की यह अपने आप को साबित करने का एक सुनहरा मौका है। हमने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए उस ज़मीन पर देशी तरीकों से खेती करना शुरू किया।


हमने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए उस ज़मीन पर देशी तरीकों से खेती करना शुरू किया। हमने एक फसल कि जगह पर मल्टी-क्रोपिंग तकनीक का उपयोग किया। इस दौरान ऐसे कई मौके आए जब आस-पास के गाँव से लोग आकर हमें समझने कि कोशिश करते थे कि हम जो कर रहें है वो सही नहीं है, इससे सिर्फ वक़्त और पैसा ही बर्बाद होगा। परंतु जब फसल हुई तब सब लोग आश्चर्यचकित रह गए। जब हमारे द्वारा उगाई सब्जियों को गाँव कि बूढ़ी औरतों ने चखा तो वे कहने लगी कि उन्होने ऐसा स्वाद पिछले 25-30 सालों बाद अनुभव किया है। उनका यह कहना ही हमारे लिए बहुत बढ़ी प्रेरणा थी, पर जब हमने उनसे पूछा कि क्या अब आप लोग जैविक खेती करोंगे तो उनका जवाब फिर भी नहीं था। क्योंकि आज कि तारीख मे किसान खाना खाने से ज्यादा बेचने के लिए उगाता है। उन्हे लगता था कि देशी तरीकों से उसकी फसल का उत्पादन कम हो जाएगा तब हमने इसे भी एक चुनौती कि तरह स्वीकार किया और कहाँ कि इस बार हम वो ही बीज उगाएँगे जो आप लोग उगाते है पर जैविक तरीकों से और इस बार जब फसल हुई तब पूरे गाँव को हमारे खेत के उत्पादन को देखकर बेहद आश्चर्य हुआ। यह उनके लिए किसी झटके से कम नहीं था कि, जहां पूरे गाँव के किसान एक एंकड़ मे 28 बोरी अनाज उगा रहे थे वही हमारे खेत से हमने एक एंकड़ से 36 बोरी अनाज उगाया था। तब से लेकर हम अब तक पूरे गाँव लगभग 100 एंकड़ ज़मीन को जैविक खेतों मे तब्दील करा चुके हैं।”

पार्थसार्थी और रेखा का सफर यही नहीं रुका। उनके सामने अब एक नयी समस्या थी कि कैसे इन किसानों कि उपज को उचित दाम और बाज़ार मिला सकें। तब वे हमारे पिछले परिंदे संगीता द्वारा शुरू किए ओरगनिक स्टोर (ReStore) मे कुछ दोस्तों के साथ इस विषय पर चर्चा कर रहे थे जो खुद भी चेन्नई के आस-पास इस तरह का काम कर रहे थे और इसी तरह कि समस्या से गुजर रहे थे। इसी विचार-विमर्श मे OFM (ओर्गेनिक फार्मर्स मार्केट) का आइडिया बाहर निकाल के आया। जहां इन लोगों ने आपस मे कुछ पैसा इकट्ठा करके किसानों से सीधे अनाज और सब्जियाँ खरीदना शुरू किया और इसे चेन्नई के कई इलाकों मे सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने का काम शुरू किया। इसकी सफलता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज चेन्नई मे OFM के 16 रीटेल स्टोर्स है और हर रोज़ कई युवा अपनी कोरपोरेट नौकरी छोड़कर खेती करने और OFM से जुडने कि इच्छा जाहीर कर रहे है।


इसकी सबसे बड़ी और खूबसूरती बात यह है कि यह पूरी तरह से एक सामुदायिक पहल का नतीजा है जहाँ आम जनता ने समस्याओं को समझते हुए उसके हल स्थानीय स्तर पर खुद खोजने शुरू किए। वे सरकार या किसी नेता और मसीहा पर निर्भर नहीं रहे। लोगों ने मिलकर इसे लोगों के लिए खड़ा किया है। ऐसे मोडल हमारी छद्म लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर एक कडा प्रहार है इससे प्रेरणा लेकर कई बड़े शहरों मे लोग इस तरह कि पहल करने कि कोशिश कर रहे है। उम्मीद है कि जल्द ही छोटे शहरों से भी लोग निकलकर बाहर आएंगे और किसानों के साथ जुड़कर ऐसे विकेंद्रित और स्थानीय स्तर पर इन समस्याओं का हल खोजेंगे।
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